Tuesday, March 7, 2017
Monday, January 30, 2017
धैर्य
सौम्या का धैर्य देख मुझे अपनी माँ से और प्यार हो गया।
माँ किसको कहते हैं
इसको महसूस किया है मैंने
और माँ को क्यों पूजते हैं
इसको भी जान लिया है मैंने
कितने धैर्य से सहेजती है नारी
अपने मातृत्व के पल
कुछ यूँ ही जैसे
सूर्य की एक किरण
हर लेती है सारा अंधकार
वैसे ही एक किलकारी में
भूल जाती है माँ अपने
सारे संताप
जीवन में चाहने वाले मिलेंगे अनेक
उन सब में माँ का प्यार है सर्वश्रेष्ठ
मेरी माँ का मेरी नानी की प्रति प्यार देखा है मैंने
बिटौनी की आवाज़ पर माँ को सेवा में तैनात देखा है मैंने
और नानी के जाते ही माँ को एक दम से बूढ़ा होते देखा है मैंने
ना जाने वो कौन सी जीवनी शक्ति है कि माँ के होते बच्चे कभी बूढ़े नहीं होते
आज नज़दीक से इस प्रेम सूत्र को देख पाया हूँ
सभी माँओं को शत शत नमन 💐💐💐
Monday, January 2, 2017
गौरैया
ताशकन्द की गलियों में
जानी पहचानी आवाज़ सुनी
जो निकला होटल से बाहर
सीधे तुमपर नज़र पड़ी
याद आ गयी बचपन की
जब आँगन में तुम आती थी
बचपन में माँ तुम्हे दिखाकर
मेरा दिल बहलाती थी
जब बड़ा हुआ तब भी तुम
मेरे आकर्षण का केंद्र रही
तुम्हारी मनोहारी छवि
मेरी स्मृति में बनी रही
जब नहीं दिखी तुम दिल्ली में
तो मन मेरा कुछ उदास हुआ
पर देख तुम्हे ताशकन्द में
मेरे मन को सुखद एहसास हुआ
तुम रहो सदा इस धरती पर
अपने कलरव को स्वर देती रहो
और अपने उपस्थिति से
मानव का ह्रदय हरती रहो
फिर दिल्ली हो या ताशकन्द
बस कहीं न कहीं मिलती रहो
#गौरैया
अकेला आदमी
भीड़ में कितना अकेला है आदमी
हाँ ..
फिर भी मुस्कुरा रहा है आदमी
पर ..
कभी तस्वीरों को ध्यान से देखो
तो दिखेगा..
मेडल लिए खुद की सेल्फी लेता
तो कभी
चाय अकेले पीता और मुस्कुराता
(चाय अमूमन कटिंग में ही मज़ा देती है जब एक की दो करके पी जाए)
फिर भी हँसी ख़ुशी
अकेलेपन की खूबियां गिनाता... आदमी🚶
🚶कुछ सोचता और धूल को पैरों से उड़ाता ...आदमी
मोबाइल पर
लैपटॉप पर
आईपॉड पर
बुलेट पर
कार पर
हवाईजहाज़ पर
पहाड़ों पर
रोड पर
सागर किनारे
पेड़ों तले
चाँद पर
सितारों पर
Sunday, October 23, 2016
Saturday, December 20, 2014
" ख़्वाब तो ख़्वाब हैं ये खरीदकर न लए जाते हैं "
ज़रा इनकी परवरिश कीजिये
ख्वाबों को ज़रा बढ़ने दीजिये ....
"कच्ची कलियाँ न तोड़ें" पुराना मुहावरा है
आप अपने अपने ख्वाबों के साथ
ऐसी नाइंसाफी न कीजिये
अपने दिल के आँगन में
ख्वाबों को ज़रा बढ़ने दीजिये .....
परवरिश कीजिये इनकी अच्छे विचारों से
बड़े-बुजुर्गों का तजुर्बा भी लीजिये
ख्वाबों को ज़रा बढ़ने दीजिये ....
आप ही जान पाएंगे
की आपके ख्वाब कितने पके हैं अभी
क्या लड़ पाएंगे ये इस दुनिया से
और जैसे ही तजुर्बा हो जाये
फिर हौसला कीजिये
इनको खुले जहाँ में निकलने दीजिये
दुनिया से लड़ने दीजिये
ख्वाबों को हकीकत बनने दीजिये
ख्वाबों को हकीकत बनने दीजिये
" ख़्वाब तो ख़्वाब हैं
ये खरीदकर न लए जाते हैं "
|
Friday, December 19, 2014
मैं भी एक घर हूँ....
बेहद साधारण सा
पर जैसे हर घर में होते हैं
मुझमे भी हैं
कई कमरे
एक आँगन जो सिमट गया है आजकल एक बालकनी में
उसी बालकनी में तुलसी का पौधा लगा हुआ है
जो पैदा हुआ है संस्कारों से
ड्राइंग रूम भी है
जिसमे सजा रखे है कई सारे चित्र
दीवारों पर लटकते हुए याद दिलाते हैं कुछ हसीन पल
कुछ और चित्रों के लिए दीवारों पर जगह अभी बाकी है
और है एक किचन
जहाँ हर रोज़ पकाता हूँ मैं अपना भोजन
और कभी-कभार 'ख़याली पुलाओ' भी
गुसलखाना भी है
जहाँ साफ़ कर लेता हूँ मैं अपना मैल
और चमका लेता हूँ अपने आवरण को
और सबसे ज़रूरी मेरा है एक मकान मालिक भी...
