ताशकन्द की गलियों में
जानी पहचानी आवाज़ सुनी
जो निकला होटल से बाहर
सीधे तुमपर नज़र पड़ी
याद आ गयी बचपन की
जब आँगन में तुम आती थी
बचपन में माँ तुम्हे दिखाकर
मेरा दिल बहलाती थी
जब बड़ा हुआ तब भी तुम
मेरे आकर्षण का केंद्र रही
तुम्हारी मनोहारी छवि
मेरी स्मृति में बनी रही
जब नहीं दिखी तुम दिल्ली में
तो मन मेरा कुछ उदास हुआ
पर देख तुम्हे ताशकन्द में
मेरे मन को सुखद एहसास हुआ
तुम रहो सदा इस धरती पर
अपने कलरव को स्वर देती रहो
और अपने उपस्थिति से
मानव का ह्रदय हरती रहो
फिर दिल्ली हो या ताशकन्द
बस कहीं न कहीं मिलती रहो
#गौरैया
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