बहुत सोचने के बावजूद इस सवाल को अभी तक सही से समझ नहीं पाया हूँ...
as the time passes we always find some changes everywhere ... हम में आप में .. हमारे आस पड़ोस में .. क्यूंकि "परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है " but the thing is this ki आज तक कुछ चीज़ें वैसी की वैसी ही हैं... जैसे कि सिक्के के दो पहलु , समय कि चाल, कांच का टूटना, निराशावादी की जीत और आशावादी की ह़ार।
शायद आखरी में कुछ गलत कह गया ... अच्छा आप सोच के बताइयेगा ...
"क्या आशावादी कि ह़ार और निराशावादी कि जीत संभव है ?"
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